अजमेर उपचुनाव : इस तरह से कांग्रेस के खाते में जा रही सीट, भाजपा को मिलती दिख रही 'मात'
अजमेर (पवन टेलर) । राजस्थान के अजमेर एवं अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर उपचुनाव के तहत 29 जनवरी को होने वाले मतदान की तारीख करीब आने के साथ ही राजनीतिक दांव-पैचों के साथ शह और मात का खेल परवान पर पहुंच चुका है। उपचुनावों में फतेह हासिल करने की कोशिशों में दोनों प्रमुख दलों (भाजपा एवं कांग्रेस) के आला नेतागण चुनावी क्षेत्रों में प्रचार एवं जनसंपर्क करने में दिन-रात एक कर जी-जान से जुटे हुए हैं। प्रचार के इस क्रम में सभी चुनावी प्रत्याशी लगातार क्षेत्र के गांव-ढाणियों में जाकर लोगों के हाथ जोड़ते दिखाई दे रहे हैं। वहीं इस कड़ी में धार्मिक भावनाओं को भुनाने का सिलसिला भी बदस्तूर जारी है। प्रत्याशी और उनके समर्थन में जुटे पार्टियों के आला नेता धार्मिक स्थलों पर भी देवरे धौकते नजर आ रहे हैं।
इस सीट पर सरकार और विपक्ष दोनों की ही साख दाव पर लगी हुई है। उपचुनावोें में जीत हासिल करने के लिए सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी दोनों ही जातिगत आधार पर चुनावी रण में जोड़तोड़ की राजनीति में जुटी हुई है। भाजपा जहां अपने बड़े वोट बैंक में कई तरह के मुद्दों को लेकर लगी सेंध से उपजे डेमेज को कंट्रोल करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस की ओर से भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी का दौर लगातार जारी है।
अजमेर सीट में अगर जातीय आंकड़ों की बात की जाए तो यहां ब्राह्मण और राजपूत समाज के मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होने का अनुमान है। माना जाता है कि ये इन दोनों ही जातियों के मतदाता भाजपा का वोट बैंक है। चूंकि कांग्रेस के प्रत्याशी भी ब्राह्मण समाज से ही आते हैं, इसलिए कांग्रेस को ब्राह्मण समाज का समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है। वहीं आनंदपाल सिंह एनकाउंटर, सीबीआई जांच का मसला और हाल ही में उपजा फिल्म 'पद्मावत' को लेकर राजपूत समाज की नाराजगी भी भाजपा के वोट बैंक को बिगाड़ती दिख रही है। यही वजह है कि बिगड़े जातिगत समीकरणों को सुधारने के लिए सत्ता और संगठन ने अपनी पूरी ताकत अजमेर में झौक रखी है।
जातिगत समीकरणों पर नजर डाली जाए तो अजमेर लोकसभा सीट पर जब 2014 में पिछले चुनाव हुए थे, तब अजमेर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में कुल 16 लाख 83 हजार 261 वोटर थे। उपचुनाव तक फाइनल वोटरलिस्ट अपडेट होने पर वोटर्स की संख्या बढ़कर कुल 18 लाख 42 हजार 992 हो गई है, जिनमें 9 लाख 41 हजार 238 पुरुष और 8 लाख 99 हजार 397 महिला मतदाता हैं। साल 2014 में 11 लाख 56 हजार 314 वोट पड़े थे, जिसमें पायलट को 1 लाख 72 वोट से हार का सामना करना पड़ा था। इस सीट पर जाट, गुर्जर, मुस्लिम और SC के प्रत्येक के दो-दो लाख वोट बराबर बताए जा रहे हैं। हालांकि हर जाति 25-25 हजार दो लाख से ज्यादा वोट बताने का दावा करती है। इनके बाद राजपूत औऱ रावणा राजपूत के करीब एक लाख 80 हजार वोट हैं। ब्राह्मण औऱ वैश्य समाज के भी करीब एक लाख से ज्यादा वोटर्स हैं, तो सिंधी 60 हजार औऱ ईसाई भी 13 हजार के करीब मतदाता है और रावत वोटर्स 52 हजार के करीब हैं। हालांकि परिसीमन से पहले रावत मतदाता एक लाख बीस हजार से ज्यादा थे, लेकिन परिसीमन के बाद ब्यावर राजसमंद लोकसभा में जाने से 70 हजार वोट कम हो गए। अन्य मतदाताओं की संख्या ढ़ाई से तीन लाख बताई जा रही है।
क्या कहते हैं सियासी समीकरण :
राजनीतिक जानकारों की मानें तो, चुंकि रघु शर्मा खुद ब्राह्मण समाज से आते हैं, ऐसे में ब्राह्मण समाज के वोट कांग्रेस को मिलने की उम्मीद की जा रही है। वहीं राजपूत समाज में भी कई मसलों को लेकर सरकार से नाराजगी बनी हुई, जिसे दूर करने के लिए भाजपा की ओर से तमाम तरह की कवायदें की जा रही है। लेकिन इनके बावजूद अनुमान जताया जा रहा है कि राजपूत समाज भी कांग्रेस के पाले में जा सकता है। ऐसे में दो बड़े निर्णायक धड़ों के कांग्रेस में चले जाने से कांग्रेस को मजबूती मिल रही है। वहीं कांग्रेस को गुर्जर वोट, मुस्लिम वोट, आनंदपाल प्रकरण के चलते राजपूत औऱ रावणा वोट अच्छी संख्या में मिलने की उम्मीदें हैं। वहीं दूसरी ओर, भाजपा को जाट, रावत, वैश्य, सिंधी, माली और अन्य जातियों के वोट मिलने की उम्मीद के चलते जीतने का पूरा भरोसा है, लेकिन जातिगत समीकरणों से परे जमीनी स्तर पर वोटर्स दोनों दलों में से किस नेता को मौका देते हैं, इस बात का फैसला तो 2 फरवरी को तभी हो पाएगा, जब चुनावी नजीजे सबके सामने होंगे।
अजमेर उपचुनाव को लेकर सियासत का केन्द्र बिंदु इन दिनों केकड़ी बना हुआ है, जहां भाजपा और कांग्रेस के विधायकों समेत कई आला नेतागण डेरा डाले हुए हैं और लगातार क्षेत्र के गांवों ढाणियों में दौरा कर रहे हैं। गौरतलब है कि उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में मौजूद रघु शर्मा साल 2008 में पहली बार केकड़ी से विधायक चुने गए थे और तत्कालीन गहलोत सरकार में केबिनेट दर्जा प्राप्त कर मुख्य सचेतक बने थे। इसके बाद साल 2013 में उन्हीं के सिपहसालार माने जाने वाले शत्रुघ्न गौतम ने बतौर भाजपा प्रत्याशी उनके खिलाफ चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। वर्तमान में गौतम भाजपा की वसुंधरा सरकार में संसदीय सचिव है।
अब तक ये रहे हैं अजमेर से सांसद :
1951 से 57 तक कांग्रेस के ज्वाला प्रसाद शर्मा
1957 से 67 तक (लगातार 2 बार) कांग्रेस के मुकुट बिहारी भार्गव
1967 से 77 तक (लगातार 2 बार) कांग्रेस के बीएन भार्गव
1977 से 80 तक जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा
1980 से 84 तक कांग्रेस के भगवानदेव आचार्य
1984 से 89 तक कांग्रेस के विष्णुकमार मोदी
1989 से 98 तक (लगातार 3 बार) भाजपा के रासासिंह रावत
1998 से 99 तक कांग्रेस की प्रभा ठाकुर
1999 से 2009 तक (लगातार 2 बार) भाजपा के रासासिंह रावत
2009 से 2014 तक कांग्रेस के सचिन पायलट
2014 से 2017 तक भाजपा के सांवरलाल जाट
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इन सबके बीच तमाम तरह के धार्मिक, राजनीतिक, जातीय एवं अन्य समीकरणों को देखते हुए भी प्रत्याशियों की कवायदें की जा रही है। अजमेर उपचुनाव की बात की जाए तो यहां भाजपा के रामस्वरूप लांबा और कांग्रेस के रघु शर्मा सीधे तौर पर चुनावी मैदान में है। इस सीट पर सांसद सांवरलाल जाट का निधन होने के बाद कराए जा रहे इस उपचुनाव में उनके बेटे रामस्वरूप लांबा और कांग्रेस के दिग्गज नेता रघु शर्मा के बीच सीधे टक्कर है। हालांकि इन दोनों के बीच होने वाली यह टक्कर अभी तक कांटे की मुकाबला बना हुआ है। लेकिन तमाम तरह के समीकरणों को देखते हुए यह सीट भाजपा के हाथ से निकलती दिखाई दे रही है। वहीं समीकरणों का फायदा उठाते हुए कांग्रेस इस सीट पर कब्जा जमाती दिखाई दे रही है।इस सीट पर सरकार और विपक्ष दोनों की ही साख दाव पर लगी हुई है। उपचुनावोें में जीत हासिल करने के लिए सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी दोनों ही जातिगत आधार पर चुनावी रण में जोड़तोड़ की राजनीति में जुटी हुई है। भाजपा जहां अपने बड़े वोट बैंक में कई तरह के मुद्दों को लेकर लगी सेंध से उपजे डेमेज को कंट्रोल करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस की ओर से भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी का दौर लगातार जारी है।
अजमेर सीट में अगर जातीय आंकड़ों की बात की जाए तो यहां ब्राह्मण और राजपूत समाज के मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होने का अनुमान है। माना जाता है कि ये इन दोनों ही जातियों के मतदाता भाजपा का वोट बैंक है। चूंकि कांग्रेस के प्रत्याशी भी ब्राह्मण समाज से ही आते हैं, इसलिए कांग्रेस को ब्राह्मण समाज का समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है। वहीं आनंदपाल सिंह एनकाउंटर, सीबीआई जांच का मसला और हाल ही में उपजा फिल्म 'पद्मावत' को लेकर राजपूत समाज की नाराजगी भी भाजपा के वोट बैंक को बिगाड़ती दिख रही है। यही वजह है कि बिगड़े जातिगत समीकरणों को सुधारने के लिए सत्ता और संगठन ने अपनी पूरी ताकत अजमेर में झौक रखी है।
ये है जातिगत समीकरण :
जातिगत समीकरणों पर नजर डाली जाए तो अजमेर लोकसभा सीट पर जब 2014 में पिछले चुनाव हुए थे, तब अजमेर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में कुल 16 लाख 83 हजार 261 वोटर थे। उपचुनाव तक फाइनल वोटरलिस्ट अपडेट होने पर वोटर्स की संख्या बढ़कर कुल 18 लाख 42 हजार 992 हो गई है, जिनमें 9 लाख 41 हजार 238 पुरुष और 8 लाख 99 हजार 397 महिला मतदाता हैं। साल 2014 में 11 लाख 56 हजार 314 वोट पड़े थे, जिसमें पायलट को 1 लाख 72 वोट से हार का सामना करना पड़ा था। इस सीट पर जाट, गुर्जर, मुस्लिम और SC के प्रत्येक के दो-दो लाख वोट बराबर बताए जा रहे हैं। हालांकि हर जाति 25-25 हजार दो लाख से ज्यादा वोट बताने का दावा करती है। इनके बाद राजपूत औऱ रावणा राजपूत के करीब एक लाख 80 हजार वोट हैं। ब्राह्मण औऱ वैश्य समाज के भी करीब एक लाख से ज्यादा वोटर्स हैं, तो सिंधी 60 हजार औऱ ईसाई भी 13 हजार के करीब मतदाता है और रावत वोटर्स 52 हजार के करीब हैं। हालांकि परिसीमन से पहले रावत मतदाता एक लाख बीस हजार से ज्यादा थे, लेकिन परिसीमन के बाद ब्यावर राजसमंद लोकसभा में जाने से 70 हजार वोट कम हो गए। अन्य मतदाताओं की संख्या ढ़ाई से तीन लाख बताई जा रही है।
क्या कहते हैं सियासी समीकरण :
राजनीतिक जानकारों की मानें तो, चुंकि रघु शर्मा खुद ब्राह्मण समाज से आते हैं, ऐसे में ब्राह्मण समाज के वोट कांग्रेस को मिलने की उम्मीद की जा रही है। वहीं राजपूत समाज में भी कई मसलों को लेकर सरकार से नाराजगी बनी हुई, जिसे दूर करने के लिए भाजपा की ओर से तमाम तरह की कवायदें की जा रही है। लेकिन इनके बावजूद अनुमान जताया जा रहा है कि राजपूत समाज भी कांग्रेस के पाले में जा सकता है। ऐसे में दो बड़े निर्णायक धड़ों के कांग्रेस में चले जाने से कांग्रेस को मजबूती मिल रही है। वहीं कांग्रेस को गुर्जर वोट, मुस्लिम वोट, आनंदपाल प्रकरण के चलते राजपूत औऱ रावणा वोट अच्छी संख्या में मिलने की उम्मीदें हैं। वहीं दूसरी ओर, भाजपा को जाट, रावत, वैश्य, सिंधी, माली और अन्य जातियों के वोट मिलने की उम्मीद के चलते जीतने का पूरा भरोसा है, लेकिन जातिगत समीकरणों से परे जमीनी स्तर पर वोटर्स दोनों दलों में से किस नेता को मौका देते हैं, इस बात का फैसला तो 2 फरवरी को तभी हो पाएगा, जब चुनावी नजीजे सबके सामने होंगे।
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सियासत का केन्द्र बना केकड़ी :अजमेर उपचुनाव को लेकर सियासत का केन्द्र बिंदु इन दिनों केकड़ी बना हुआ है, जहां भाजपा और कांग्रेस के विधायकों समेत कई आला नेतागण डेरा डाले हुए हैं और लगातार क्षेत्र के गांवों ढाणियों में दौरा कर रहे हैं। गौरतलब है कि उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में मौजूद रघु शर्मा साल 2008 में पहली बार केकड़ी से विधायक चुने गए थे और तत्कालीन गहलोत सरकार में केबिनेट दर्जा प्राप्त कर मुख्य सचेतक बने थे। इसके बाद साल 2013 में उन्हीं के सिपहसालार माने जाने वाले शत्रुघ्न गौतम ने बतौर भाजपा प्रत्याशी उनके खिलाफ चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। वर्तमान में गौतम भाजपा की वसुंधरा सरकार में संसदीय सचिव है।
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2013 में चुनाव हारने के बावजूद रघु शर्मा के लगातार 4 साल से क्षेत्र में सक्रिय रहने के चलते उपचुनावों में उन्हें यहां से अच्छा—खासा जनसमर्थन मिलता दिखाई दे रहा है। वहीं दूसरी ओर, इस दौरान गौतम के क्षेत्र में कामकाज की कमी और नकारात्मक राजनीति को लेकर उपचुनाव में भाजपा को जनता के मुखर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। शायद यही वजह है कि अभी दो दिन पहले खुद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने केकड़ी का दौरा किया था और यहीं से उपचुनाव में प्रचार का आगाज किया था। सीएम राजे ने केकड़ी में विभिन्न समाजों के लोगों के साथ बैठक कर भाजपा के लिए समर्थन की अपील की थी। वहीं इलाके के कार्यकर्ताओं की बैठक लेकर डेमेज कंट्रोल की पूरजोर कोशिश की थी। ऐसे में माना जा रहा है कि रघु शर्मा यहां से बड़े पैमाने से लीड़ ले सकते हैं। बहरहाल, ऐसे में अब ये देखना दिलचस्प होगा कि विधायक गौतम अपने इलाके में भाजपा को बढ़त दिला पाने में कितना कामयाब हो पाते हैं।अब तक ये रहे हैं अजमेर से सांसद :
1951 से 57 तक कांग्रेस के ज्वाला प्रसाद शर्मा
1957 से 67 तक (लगातार 2 बार) कांग्रेस के मुकुट बिहारी भार्गव
1967 से 77 तक (लगातार 2 बार) कांग्रेस के बीएन भार्गव
1977 से 80 तक जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा
1980 से 84 तक कांग्रेस के भगवानदेव आचार्य
1984 से 89 तक कांग्रेस के विष्णुकमार मोदी
1989 से 98 तक (लगातार 3 बार) भाजपा के रासासिंह रावत
1998 से 99 तक कांग्रेस की प्रभा ठाकुर
1999 से 2009 तक (लगातार 2 बार) भाजपा के रासासिंह रावत
2009 से 2014 तक कांग्रेस के सचिन पायलट
2014 से 2017 तक भाजपा के सांवरलाल जाट
